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RCEP refused, how much the deal for India

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आरसीईपी, जिसे रीजनल कंप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप के नाम से जाना जाता है, आसियान के दस देशों और उनके छह डायलॉग पार्टनर देशों के बीच एक समग्र मुक्त व्यापार क्षेत्र का मसौदा है जिसके संदर्भ में इन सोलह देशो के बीच बातचीत नवम्बर 2012 से जारी है, और माना जा रहा है कि 2020 में आरसीईपी के मसौदे पर सभी देश (भारत के अलावा) दस्तखत कर देंगे.

भारत फिलहाल इस समझौते का हिस्सा नहीं है लेकिन ऑस्ट्रेलिया, जापान, और थाईलैंड समेत असियान के तमाम देशों ने यह उम्मीद जताई है कि भारत आरसीईपी समझौते को गम्भीरता से लेगा और जल्द ही आरसीईपी में साझेदार बनेगा. उन्होंने यह भी कहा कि भारत के लिए आरसीईपी मसौदे के दरवाजे हमेशा खुले हैं.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने बयान में साफ तौर पर कहा कि वर्तमान प्रतिरूप में आरसीईपी भारतीय अर्थव्यवस्था के अनुकूल नहीं है. भारत की चिंताओं और हितों का समावेश भी इसमें पूरी तरह नहीं किया गया है और इसके चलते भारत आरसीईपी समझौते का हिस्सा बनने का फिलहाल इच्छुक नहीं है.

आरसीईपी समझौते में असियान के दस देशों के साथ साथ उनके छह डायलॉग पार्टनर चीन, जापान, भारत, दक्षिण कोरिया, आस्ट्रेलिया, और न्यूजीलैंड शामिल हैं.

अगर भारत आरसीईपी का हिस्सा बनता तो मसौदे पर सबकी सहमति के बाद यह जनसंख्या और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) दोनों की दृष्टि से विश्व का सबसे बड़ा मुक्त व्यापार क्षेत्र (फ्री ट्रेड एरिया) बन जाता हालांकि फिलहाल अब यह संभव होता नहीं दिख रहा है.

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भारत का मानना रहा है कि असियान के साथ होने वाले आर्थिक सहयोग के मामलों में पूरी तत्परता के साथ भाग लेना चाहिए. लुक ईस्ट/ऐक्ट ईस्ट नीति का भी यह महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. इसी नीति के चलते भारत ने असियान देशों के साथ 2010 में भारत-आसियान मुक्त व्यापार क्षेत्र (वस्तु संबंधी) मसौदे पर हस्ताक्षर किए थे. हालांकि इसके चलते भारत को व्यापार में नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि मसौदे में भारत के महत्वपूर्ण सेवा क्षेत्र (सर्विसेज सेक्टर) को तरजीह नहीं मिल पाई और इसे सुधारने में पांच साल लगे जब 2015 मे भारत आसियान सेवा और निवेश सम्बन्धी समझौता प्रभाव मे आया. पिछले लगभग दस सालों में भारत को आसियान से व्यापार में नुकसान ही उठाना पड़ा है.

आरसीईपी को लेकर भारत की कई चिंताएं रही हैं. चीन के सस्ते उत्पादों की डम्पिंग इनमें सबसे बड़ा खतरा रहा है. 2018 में भारत-चीन के द्विपक्षीय व्यापार में भारत को 53 बिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ा जो उसके निर्यात से तीन गुना बड़ा है. मामल्लपुरम में प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्र्पति शी जिनपिंग की वार्ता के दौरान मोदी ने इस मुद्दे को उठाया था और इस पर खासी चिंता भी जताई थी. बहरहाल चीन ने अब तक इस मुद्दे पर भारत को कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया है.

पिछले सात सालों में आरसीईपी मसौदों पर चर्चा के दौरान भी चीन ने भारत पर लगातार दबाव बनाए रखा और एक समय ऐसी स्थिति भी आई जब चीन ने भारत के बिना ही आरसीईपी समझौते को मूर्तरूप देने का आह्वान कर डाला हालांकि समझौते में जापान, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की बड़ी भूमिका और योगदान रहा है. चीन की इस बेसब्री का राज किसी से छुपा नहीं है. अमेरिका से कारोबारी जंग की मार और उसके चलते अर्थव्यवस्था में आयी मंदी झेल रहे चीन के लिये आरसीईपी क्षेत्र का नया बाजार एक बड़ी राहत का सबब बनेगा. ध्यान देने की बात है कि चीन का जापान या भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से कोई द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता नहीं है. निश्चित तौर पर आरसीईपी चीन के लिए व्यापार के नए नए मौके बनाएगा.

भारत के लिए दूसरी बड़ी चिंता का विषय है कृषि क्षेत्र. ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के उलट भारत की कृषि व्यवस्था जीवन-निर्वाह पर आधारित है. छोटी जोतें, पिछड़ी तकनीक, वर्षा पर निर्भर फसलें और जोखिम ना ले सकने की क्षमता ने कृषि व्यवस्था और देश के छोटे और मझोले किसानों को दशकों से बेहाल कर रखा है. कपड़ा उद्योग के साथ ही अत्यंत लघु, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र का भी यही हाल है.

इसी से जुड़े डेयरी क्षेत्र की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है. हालांकि अमूल और इसी तरह की कोऑपरेटिव सोसाइटी व्यवस्था ने इसमें काफी बदलाव किया है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के डेयरी उद्योग के आगे भारत की कोई भी कोऑपरेटिव संस्था एक कामचलाऊ व्यवस्था से ज्यादा कुछ नहीं लगती है. देश के हरेक आदमी की रोजाना की दूध की खपत को तो कोऑपरेटिव संस्थायें मिलकर पूरा कर ही नहीं पा रही हैं. यही वजह है कि देश में कालाबाजारी और मिलावट को सिर उठाने का मौका मिलता है. 

हालांकि उपरोक्त उद्योगों की चिंताओं को नकारा नहीं जा सकता, ये स्थिति कब और कैसे बदलेगी इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है. यह एक यक्षप्रश्न है जिसे देश के नीतिनिर्धारक वर्षों से नकार रहे हैं. 1991 से भारत में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया चल रही है, और इन लगभग तीस वर्षों में भी यदि भारत का कृषि क्षेत्र अक्षम और दयनीय है तो यह देश के नीतिनिर्धार्कों के लिए एक शर्म का विषय होना चाहिए. चीन मे आर्थिक उदारीकरण 1980 के दशक में शुरू हुआ और आज वह मुक्त आर्थिक व्यव्स्था का अगुआ बन बैठा है.

आरसीईपी की नवम्बर बैठक से पहले देश के कई उद्योग समूहों ने इस मसौदे का विरोध किया. आश्चर्यजनक रूप से इनमें स्टील, रबर और कई ऐसे उद्योग समूह हैं जिनका बड़ा कारोबार और देश की सत्ता में भी दखल है. इन समूहों के विरोध की वजह है उनकी एकाधिकार बनाए रखने की इच्छा और संरक्षणवादी नीतियों को समर्थन. राजनीतिक दलों से नजदीकियों का भी उन्हें फायदा मिला है.

जो भी हो, आरसीईपी मसौदे को फिलहाल दरकिनार कर भारत अपने कमजोर (और संरक्षणवादी बड़े उद्योगों को भी) क्षेत्रों को बचाने में तो सफल रहा है, और यह समझदारी भरा निर्णय भी है, लेकिन इस निर्णय के दूरगामी परिणाम होंगे. क्षेत्रीय सप्लाई चेन का हिस्सा नहीं बन पाना भारत के लिये समस्याएं खड़ी करेगा. यह भारत की आर्थिक रूप से अंतर्मुखी होने को और बड़ी समस्या का रूप दे सकता है. मतलब साफ है, आरसीईपी मसौदे से बाहर आने ने सरकार, उद्योगपतियों, अर्थशास्त्रियों, किसानों, और नागरिकों के आत्ममंथन की आवश्यकता को उजागर किया है.

आज भारत मे यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा होना चाहिये कि हमारी अर्थव्यवस्था इतनी लचर, हमारे उद्योगपति इतने संरक्षणवादी और हमारे किसान इतने कमजोर क्यों और कैसे है कि हम एक क्षेत्रीय मुक्त व्यापार का हिस्सा भी नहीं बन सकते.

(राहुल मिश्रा मलय यूनिवर्सिटी में सीनियर लेक्चरर और दक्षिण पूर्व एशिया के जानकार हैं.)

Article was first appreared at DW.com in Hindi

Last Updated: 18/11/2019